क्या कभी किसी ने इस बात पर विचार किया है,कि अगर आपका नाम,पेशा, रिश्ते,उपलब्धियां सब बदल दी जाएं तो आपके पास क्या होगा ?
मुझे पता है कुछ लोगों के मन में तुरंत जवाब आया होगा,कि ‘मैं ‘।
क्या ये वही ‘मैं ‘है जो वास्तविक आपकी पहचान है,या वो जो बाहरी?
हम अपने दिखावटी या भौतिक चीज़ों में इतना जकड़े हुए हैं कि अपनी वास्तविक पहचान को जानना ही नहीं चाहते।या उस पर विचार करना नहीं चाहते,क्यों कि हमें लगता है कि अगर हमने अपनी” मैं “को पा लिया तो हम इन दिखावटी चीजों से दूर हो जाएंगे ,जो हमारे लिए अभी सबसे अमूल्य है।
लेकिन इतिहास से ही इस विचार पर प्रश्न उठते आए हैं, और जवाब के खोज में लोगों ने अपने भौतिक चीज़ों का त्याग तक किया है।
इसका सबसे महान उदाहरण, सिद्धार्थ का है,जिन्होंने अपनी वास्तविक पहचान के लिए अपना नाम , अपने बंधन,अपनी पहचान का भी त्याग कर दिया।जिन्होंने राजमहल से जंगल तक का कि यात्रा तय की “अपनी वास्तविक मैं “के लिए। और अंत में उन्होंने सिद्धार्थ से महात्मा बुद्ध कहलाये।
ऐसी ही जिज्ञासा समय-समय पर अनेक विचारकों और दार्शनिकों के चिंतन का आधार बनी। भारत में स्वामी विवेकानंद, रमण महर्षि और कबीर जैसे महापुरुषों ने मनुष्य को अपने भीतर झाँकने का मार्ग दिखाया। वहीं विश्व के विचारकों में सुकरात, रेने देकार्त और अनेक दार्शनिकों ने भी मनुष्य के अस्तित्व और उसकी वास्तविक पहचान पर गहन प्रश्न उठाए। युग बदलते रहे, सभ्यताएँ बदलती रहीं, लेकिन यह प्रश्न आज भी उतना ही जीवंत है—”आख़िर मैं कौन हूँ?”
लेकिन हम इतना व्यस्त हैं कि ,शायद अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न पूछने के लिए समय ही नहीं निकाल पाते हैं।हम अपने नाम , पेशा,समाज ,सोशल मीडिया, और अपने इर्द – गिर्द की उलझनों में जकड़े हुए हैं। और धीरे – धीरे हम यही मानने लगते हैं,कि यही “मैं” हूँ।लेकिन ये सब बदल सकते हैं,नौकरी,रिश्ते,पहचान यहां तक कि शरीर भी,फिर आखिर में वही सवाल खड़ा हो जाता है,कि अगर सब बदल सकता है,तो वास्तविक क्या है?
शायद इसी कारण हर युग में दार्शनिकों ने बाहर की दुनिया जितने से पहले, स्वयं के भीतर उतरने की बात की है। क्यों की जिसने स्वयं को जान लिया उसके लिए संसार बदलने से पहले स्वयं को बदलना संभव होता है।
“मैं कौन हूँ” ? ये केवल आध्यात्मिक प्रश्न नहीं है।ये जीवन जीने का प्रश्न है।जब तक हम ये नहीं जानेंगे कि हमारी वास्तविक पहचान हैं? तब तक हम दूसरों के द्वारा बनाई गई पहचान के साथ ही जिएंगे।
हो सकता है कि सबसे कठिन यात्रा दुनिया घूमने की नहीं, बल्कि स्वयं तक पहुँचने की हो। तो प्रश्न अभी भी आपके सामने है—”आख़िर मैं कौन हूँ?”
इसका जबाव खोजिए।

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