Simaye

सीखने की कोई उम्र नहीं होती: जब जागो, तभी सवेराआज का सुविचार (Thought of the Day):”सीखने की कोई उम्र नहीं होती, जब भी मन करे कुछ नया सीखने का, तो सीख लेना चाहिए। क्योंकि जब तक हम सीख रहे हैं, तब तक ही हम ज़िंदा हैं, वरना एक ज़िंदा लाश के अलावा कुछ और नहीं।”उम्र की सीमा और समाज का दोहरापनआज बात करते हैं हम अपने उस विचार पर, जो हमें हर पल ये याद दिलाता रहता है कि—”अब तुम इस एज (age) में हो कि अब पढ़ाई भी नहीं कर सकती या फिर कुछ नया नहीं सीख सकती, क्योंकि अब तुम्हारी शादी की उम्र हो गई है।”अब सोचने वाली बात ये है कि हमारे अंदर ये विचार आता कहां से है? तो ये भी उसी समाज की देन है, जिसने आज तक हमें इतना कुछ ऐसा दिया है जो शायद ही हमारे लिए बेहतर हो। क्योंकि इसमें तो कुछ बेहतर नहीं होगा हमारे लिए कि यह तय कर दिया गया कि अब ये उम्र हमारे पढ़ने की नहीं रही, अब ये उम्र हमारी शादी की है, या ये उम्र हमारे घर से बाहर न जाने की है। ये सीमाएं बना दी गई हैं हमारे लिए—और यहाँ ‘हमारे’ से मतलब, हम महिलाओं और लड़कियों से है।मध्यम वर्गीय समाज और ‘झूठी इज्जत’ का सचसमाज को भी अच्छी तरह पता है कि अगर हमें ज़रा सी भी उड़ान दी गई, तो हम इतना ऊंचा उड़ेंगे जो इस समाज के बनाए गए नियम-कानूनों पर एक करारा तमाचा होगा। और ये वो तमाचा होगा जो उनके अहंकार को तोड़ के रख देगा, उनकी दोहरी सच्चाई को सबके सामने ला देगा।यहाँ समाज से मेरा मतलब ‘मध्यम वर्गीय समाज’ (Middle-Class Society) से है। क्योंकि इसी समाज ने एक झूठी इज्जत की चादर ओढ़ कर रखी है, और वो इज्जत भी इनकी लड़कियों और महिलाओं के ऊपर ही निर्भर करती है। मुझे आज तक ये समझ नहीं आया कि आखिर ऐसी कौन सी इज्जत है इनके पास, जो इनको लड़कियों और महिलाओं को दबा कर रखने पर ही मिलती है?दिखावे की दुनिया में पिसती जिंदगीये सवाल मैं चाहती हूँ कि सभी लड़कियां या महिलाएं अपने आप से पूछें—क्या हमारे डर के रहने पर ही इनकी इज्जत बनी रहेगी? या हम अपने सपनों का गला घोंट कर जिएं, तो इन्हें कोई दिक्कत नहीं होती?सबसे बड़ी बात तो ये है कि इसके बारे में कोई बात भी नहीं करना चाहता है। पता नहीं क्यों, हम मध्यम वर्गीय लड़कियां कहीं बीच में फंस के रह गई हैं। एक उच्च वर्गीय समाज और एक निम्न वर्गीय समाज के बीच, हमारे बारे में कोई बात ही नहीं करना चाहता। क्यों? क्योंकि उन्हें लगता है कि हम तो एक खुशहाल जीवन जी रहे हैं। पर यहाँ होता एकदम विपरीत है—दिखाया कुछ और जाता है और होता कुछ और है!खुद बनना होगा अपनी आवाज़धीरे-धीरे इस समाज के बीच रहते-रहते मुझे ये समझ में आया कि यहाँ कोई भी ऐसा नहीं है जो हमारी बात करेगा। इसलिए, हमें अपनी बात को लोगों तक पहुँचाने खुद ही आगे आना होगा। जब तक हम खुद नहीं आएंगे ये बताने कि हमारे साथ क्या हो रहा है या हम इतने दबे और डरे हुए क्यों हैं, तब तक कुछ नहीं बदलेगा। क्यों हमें एक ऐसे समाज का हिस्सा बना दिया गया जिनकी इज्जत इस बात में है कि हम घर में ही रहें, हमारी कुछ सीमाएं हों और हम उनसे बाहर न निकलें? अपने सपनों को मार कर जिंदगी जिएं—क्या यही हमारा सही जीवन है? क्या इसी में मेरी और समाज की भलाई है?लेकिन मैं यहाँ एक बात बार-बार बोलती हूँ अपने हर एक आर्टिकल में—जितनी गलती समाज की है, उतनी ही गलती हमारी भी है। क्यों हम भी इस दिखावटी इज्जत को अपनाना चाहते हैं? क्यों हमें भी इसका हिस्सा बनना है? क्यों आखिर हम इस समाज द्वारा बनाई गई ‘सजावटी गुड़िया’ बने रहना चाहती हैं? इस बात पर जरा ध्यान दीजिए। क्यों हम एक आम सी जिंदगी जीना चाहते हैं? क्यों कोई और हमारे लिए सीमाएं बनाए?चरित्र पर सवाल और गाँव की हकीकतकौन होते हैं ये लोग ये बताने वाले कि—”अरे, तुमने तो 12th कर ली, अब तुम्हारी शादी की उम्र हो गई!” अगर हमने जैसे-तैसे कुछ समय मांग भी लिया, तो उसमें भी हमारे चरित्र (Character) पर सवाल खड़े कर दिए जाते हैं। ये सच्चाई है अभी भारत के उस मध्यम वर्गीय समाज की, जो ज़्यादातर गांवों से संबंधित है।मैं भी उसी समाज का एक हिस्सा हूँ। मैंने भी अपने जीवन के वो कीमती समय को बर्बाद कर दिया इसी समाज के लिए, कि आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों, कभी तो ये हमारे लिए या हमें कुछ करने देंगे। पर ऐसा हुआ नहीं! अंत में समझ आया कि यहाँ जो भी करना है, हमें खुद करना पड़ेगा, अपने लिए कोई और खड़ा नहीं होगा।आप अकेली नहीं हैं: खुद बनिए अपनी आज़ाद सुबहफिर मुझे लगा कि मैं अकेली तो इस समाज का हिस्सा नहीं हूँ। पता नहीं मेरे जैसी कितनी जिंदगियां यहाँ फंसी हुई हैं और हर रोज़ घुटन भरी जिंदगी जी रही हैं—इसी आस में कि कोई आएगा उन्हें वहाँ से निकालने। लेकिन एक बात मैं आपको साफ़-साफ़ बता दूँ—कोई और नहीं आएगा आपके लिए, आप खुद ही अपने आप को वहाँ से आज़ाद कर सकती हैं।मैं भी आपको अपने लेखन से, अपनी कहानी से लड़ने की एक उम्मीद दे सकती हूँ और हिम्मत भी, कि आप अकेली नहीं हो इस लड़ाई में। उम्मीद की एक छोटी सी छड़ी ही आपको पार होना सिखा देगी, इस दोहरे और दिखावटी समाज के हाईवे को!एक छोटी सी विनती:आखिरी में मेरी एक विनती है, अगर आपको मेरा लेखन अच्छा लगे या इसमें थोड़ी भी सच्चाई नज़र आए, तो प्लीज Comment और Like करें, साथ ही मेरी वेबसाइट को Subscribe कर लें।

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