एक यात्रा ऐसी भी

यात्राएं आखिर ये करना क्यों जरूरी होता हैं कभी किसी ने सोचा क्या ? अगर आप में से किसी ने कभी इस विषय पर विचार नहीं किया तो करना ,ओर पूछना अपने आप से क्यों हम कही अचानक से किसी यात्रा पर जाना चाहते हैं, या क्यों हम यात्रा करते हैं।शायद यहां कुछ लोग इस बात को पढ़ कर ये सोचेंगे की आखिर हम अपने आर्टिकल में यही सबसे पहले क्यों पूछ रहे है।

एक यात्रा ऐसी भी

तो चलिये हम आपको यात्रा के बारे में कुछ बताते हैं।आखिर क्यों हम यात्रा करना चाहते है, क्यों कि हमारा जीवन ही एक यात्रा है जिसकी शुरुआत उस दिन से हो जाती हैं जिस दिन हमने इस दुनिया में अपनी पहेली साँस ली थी,पर जब भी यात्रा शब्द कही दिखता है या हम सुनते हैं तो हमारे मन में सबसे पहला ख्याल यही आता है की चलो कही बाहर घूम आते हैं, पर ये उनके लिए ही होता है जिन्हें आजादी मिली होती हैं कहीं भी आने जाने की, अधिकांश लोग इससे वंचित रह जाते हैं। लेकिन ये कोई भी नहीं जानता है या जानना नहीं चाहता है कि यात्रा तो हर इंसान कर रहा है अपने जीवन में , चाहें उसके संघर्ष हो या किसी ओर तरह की लड़ाई, हम क्यों नहीं ये देखना चाहते है कि इस दुनियां में हर इंसान अपनी एक अलग ही यात्रा पर निकला है। अगर बात हम अपनी यात्रा की करें तो मेरी यात्रा तो अभी उस संघर्ष में है जहां लोग अक्सर हार ही जाते है ओर वो संघर्ष जब अपनो से होता हैं, हम भी उसी में फसे हुए हैं देखते है आखिर हम अपनी इस यात्रा को पूरा करते हैं या रुक जाएंगे। मेरी ही तरह बहुत से लोग इसमें फसे हुए हैं।

आखिरकार ये यात्रा शुरू कहां से हुई क्यों सब इसमें ही आकर फस जाते हैं? तो इसका जवाब भी जान लो जो शुरू होती हैं समाज की रूढ़िबादी सोच से,इसमें ऐसा नहीं कि सिर्फ एक ही वर्ग यात्रा कर रहा हो,इसमें तो हर वर्ग के लोग फसे हुये है।

यात्रा का सिर्फ यही मतलब नहीं होता की किसी एक स्थान से दूसरे स्थान तक, वो भी कुछ चुनिंदा स्थानों पर जाना । इसको यात्रा कहना तो ठीक नहीं है क्यों की यात्रा तो वो है जो हमें जीने का एक नजरिया देती है ओर वो यात्रा बाहरी भी हो सकती है ओर आंतरिक भी , अब यहां ये आंतरिक यात्रा का जिक्र इसलिए किया है कि अगर हम अपनी ही आंतरिक यात्रा नहीं कर पाए तो हम वो कभी भी नहीं बन पाएंगे जो हम है।फिर तो हम सिर्फ एक कठपुतली बन कर ही जीवन जिएंगे। क्या हमें ये मंजूर है , कि हम अपना जीवन सिर्फ दूसरों की कठपुतली बन कर ही निकाल दें?

हमारी सबसे कठिन यात्रा ही हमारी आंतरिक यात्रा होती है अगर इसको पूरा कर लिया तो हम अपनी उस मंजिल तक पहुंच जाएंगे जिसके लिए हम सब इस संसार में आए हैं,पर हम कभी इस यात्रा को करना ही नहीं चाहते । हम तो सिर्फ यात्रा के नाम पर कुछ सीमित जगहों पर चले जाते,हम इस यात्रा को भी सच्चाई से नहीं करते कि हम अगर यात्रा पर निकले हैं तो एक ऐसी यात्रा करे जो हमारे जीवन में कुछ बदलाव लाये , ओर उस बदलाव से हम किसी ओर के जीवन को बेहतर बना सके ।

क्यों कि इस समाज में ऐसे बहुत से लोग हैं जो यात्रा तो करना चाहते है,पर उन्हें उसकी आजादी नहीं है,ऐसा ज्यादातर महिलाओं के साथ ही होता हैं।अगर वो यात्रा करने की सोचती भी है तो समाज की रूढ़िबादी सोच उनके सामने आकर खड़ी हो जाती हैं, क्यों इस समाज में आखिर उनके लिए इतने सीमित सीमाएँ बनाई है।

जहां तक बात रही आंतरिक यात्रा की तो उसको करने के लिए भी ज्ञान की जरूरत होती है।उसके लिए भी सीमित सीमाएँ बना दी गई है, कितना पढ़ना है कब तक पढ़ना है,क्या पढ़ना है। जब तक हमें ज्ञान ही नहीं होगा कि क्या सही है क्या गलत तब तक हम आंतरिक यात्रा भी नहीं कर पाएं ।

ये ठीक वैसे ही है जैसे एक गोताखोर को अगर पता न हो की, समुद्र की गहराई कितनी है, तो क्या वो उतना गोता लगा पाएगा।

इस लिए हमें अपनी आंतरिक यात्रा के लिए ज्ञान चाहिए , चाहें फिर वो समाज का काेई भी वर्ग क्यों न हो। यात्राएँ चाहें आंतरिक हो या बाहरी ,लेकिन अगर कोई भी कर ली न तो इस समाज में बदलाव आना शुरू हो जाएगा । जिसकी जरूरत समाज को अभी बहुत है,इस लिए यात्रा करना शुरू कर दो, जिस प्रकार की भी यात्रा करो बस शुरू कर दो।जिससे जो समाज की रूढ़िबादी सोच में जकड़े हुए लोग हैं उन्हें आजादी दिला सको,इस समाज से ।

क्या आप मेरा इस यात्रा में साथ दोगे ? अगर देना चाहते हो तो आज से ही अपनी यात्रा शुरू कर दो ।फिर वह आंतरिक हो,या बाहरी।

चलिए एक नई यात्रा की शुरुआत करते हैं हम सब मिल कर ।

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