आज हम आप सभी से कुछ जानना चाहते हैं, कि आखिर वास्तविक सुंदरता क्या है? इस सवाल का कोई जवाब देगा मुझे। क्यों की इस विषय पर आज हम कुछ कहना चाहते हैं, कि क्यों लोग ये समझ नहीं पाते की आखिर सुंदरता क्या है?
हम जिस समाज में रह रहे हैं उसमें बाहरी सुंदरता को इतना कीमती बना दिया गया कि हम अपनी असली सुंदरता को पहचानना ही नहीं चाहते, हमें लगता है कि बाहरी सुंदरता ही हमारे जीवन का आधार है।अगर हम बाहर से सुंदर और आकर्षित नहीं दिख रहे,इसका मतलब की हमारा जीवन ही बेकार है।
क्यों हम अपने ही शरीर से इतनी नफ़रत करने लगते हैं?क्या कभी किसी ने इस बात पर ध्यान दिया है, क्यों हम एक ऐसे इंसान को देखकर खुद को कम आंकने लगते हैं, जो सिर्फ बाहरी सुंदर है। चाहें वो हर बात में हमसे बेहतर न हो, लेकिन हम फिर भी उसको देखकर खुद को कम समझ लेते है।
ओर ये सब कर के हम स्वयं के साथ कितना गलत कर रहे होते हैं ये हमें पता भी नहीं चलता।
आखिर अब सोचने वाली बात ये है कि हमारे दिमाग में ऐसा ख्याल आता कहां से, इसके लिए भी हमारा समाज ही जिम्मेदार है। क्यों की इसने हमें हर जगह ये बताया कि बाहरी सुंदरता ही सब कुछ होती हैं, जो दिखने में जितना ज्यादा सुंदर या आकर्षित है वह समाज की नजरों में सबसे बेहतर है।
हमें बचपन से ही ये सिखाया जाने लगता है,जब तक हम समझ सकते कि क्या सही क्या गलत , तब तक हम भी दिखावटी सुंदरता के लिए तुच्छ वस्तुओं में जकड़ जाते हैं।ये एहसास हमें जब होता है, हम खुद से ही नजर नहीं मिला पाते कि हमने बचपन से अब तक कितना गलत किया होता है अपने साथ।
क्यों हमें ये बताया नहीं जाता कि आखिर वास्तविक सुंदरता क्या होती है? हम उसको कैसे अपनाए । हम कैसे खुद को उसके काबिल बना सके । क्या कभी हम वास्तविक सुंदरता के बारे में विचार करते हैं,या किसी से इस बात पर चर्चा करते हैं। शायद सभी का जवाब न ही आयेगा।
क्यों हम ऐसा नहीं करते,जैसे हम बाहरी सुंदरता के लिए सभी से बात करेंगे कि हम कैसे खुद को इतना आकर्षित बना सके । पर कभी वास्तविक सुंदरता पर नहीं। तो चलिए आज जानते हैं कि आखिर वास्तविक सुंदरता क्या है?
वास्तविक सुंदरता किसी दूसरे की आंखों का मोहताज नहीं है। यह हमारे भीतर की वह शांति है जो तब महसूस होती है जब हम ‘दूसरों जैसे दिखने’ की दौड़ से बाहर निकलकर ‘खुद जैसा होने’ का साहस करते हैं। जिस दिन हम अपनी खामियों को अपनी ताकत मानना सीख जाएंगे, उस दिन हमें किसी से खुद की तुलना करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। क्योंकि असली सुंदरता सजना-संवरना नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व को गर्व के साथ गले लगाना है।”
जब भी हम खुद को आईना में देखें तो ये महसूस न करे कि हम बाहरी सुंदर है या नहीं, बस हमें स्वयं को देखकर ऐसा लगे कि क्या ताकत है हम में, जो दूसरों से कहीं ज्यादा सुन्दर ओर अलग बनाती है।हम जब भी खुद को देखें हमें खुद से ही प्रेम हो जाए। हमें ये महसूस न हो की कौन कितना आकर्षित है।
अंत में, वास्तविक सुंदरता का कोई पैमाना नहीं होता, क्योंकि यह कोई भौतिक वस्तु नहीं जिसे बाजार से खरीदा जा सके। यह हमारे भीतर की वह शांति है जो तब महसूस होती है जब हम ‘दूसरों जैसे दिखने’ की दौड़ से बाहर निकलकर ‘खुद जैसा होने’ का साहस करते हैं। जिस दिन हम अपनी खामियों को अपनी ताकत मानना सीख जाएंगे, उस दिन हमें किसी से तुलना करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। याद रखिए, असली सुंदरता सजना-संवरना नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व को गर्व और पूरे सम्मान के साथ गले लगाना है।”
अलविदा मेरे मित्रों फिर मिलेंगे एक नए विचार के साथ।
आपको इसमें सबसे सुंदर पार्ट कौन सा लगा है
LikeLiked by 1 person