आसमाँ तक…
एक चाहत, एक नीला आसमाँ। क्या हम सब इसे हर रोज़ नहीं देखते? क्या हम अपने अंदर उस एक आवाज़ को नहीं सुनते जो बार-बार पूछती है—”कब हम उस आसमाँ में उड़ेंगे?”
हम लड़कियों की ज़िंदगी अक्सर एक बंद कमरे की खुली खिड़की से शुरू होती है। वही खिड़की हमें याद दिलाती है कि हमें इस कमरे से निकलना है, क्योंकि बाहर एक बहुत सुंदर जहाँ हमारा इंतज़ार कर रहा है। अक्सर होता यह है कि हम इसी दुनिया में आते हैं और चले जाते हैं, मगर उस खिड़की से बाहर निकलकर उस सुंदर नज़ारे को देखने की हिम्मत नहीं जुटा पाते।
समाज की अनकही उलझनें
हम अपनी अनकही उलझनों में उलझे रहते हैं—कौन क्या कहेगा? लोग कैसे देखेंगे? सच तो यह है कि ये उलझनें हमारी नहीं, उस समाज की हैं जो हर कदम पर हमें यह दिखाना चाहता है कि हम सिर्फ एक कमरे में कैद होने के लिए पैदा हुई हैं। और इसमें सबसे मजेदार और दुखद बात यह है कि हमें यह सीख देने वाला अक्सर कोई पुरुष नहीं, बल्कि एक महिला ही होती है।
हमें इतना बेबस महसूस कराया जाता है। हर पल याद दिलाया जाता है कि एक पुरुष के बिना हमारा जीवन, जीवन नहीं है। लेकिन मैं पूछती हूँ, क्यों? क्या हमारा वजूद सिर्फ किसी का सहारा लेने के लिए है?
बाज़ जैसा संघर्ष
हम उस घुटन भरी ज़िंदगी को जीना शुरू कर देते हैं, यह सोचकर कि “शायद यही मेरी ज़िंदगी है।” लेकिन हम उस आसमाँ को देखना बंद नहीं करते। हर रोज़ उस नीले आसमाँ को देखकर मन में एक नयी रोशनी जन्म लेती है। यह वही रोशनी है जो हमें अंदर से ताकत देती है—अपनों के खिलाफ लड़ने की और खुद के सपनों के लिए संघर्ष करने की।
बिल्कुल उस बाज़ की तरह, जो बूढ़ा होने पर अपने ही दर्द सहते हुए अपने नखून तोड़ता है और भारी पंखों को अपनी चोंच से उखाड़ता है, ताकि वह नयी शक्ति के साथ फिर से सबसे ऊँची उड़ान भर सके। आज हर लड़की को वही दर्द सहना पड़ रहा है, अपनी पुरानी बेड़ियों को तोड़ने के लिए।
एक नयी उम्मीद की किरण
कभी-कभी लगता है कि सब खत्म हो गया, रास्ते बंद हैं। पर तभी अचानक कहीं से एक उम्मीद की किरण जागती है। मेरे साथ भी ऐसा हुआ। जब लगा कि चारों तरफ सिर्फ अंधेरा है, तब एक ऐसी आवाज़ ने मेरे कानों में गूँज की, जैसे किसी ने एक छोटी बच्ची को अपनी उंगली थमा दी हो। मुझे समझ आया—हम इतने कमज़ोर नहीं कि आसानी से हार मान लें।
लेकिन, अगर बदलाव लाना है, तो पहले खुद में परिवर्तन लाना होगा। हमें समाज की उन पुरानी परंपराओं से आज़ाद होना होगा जिन्होंने हमें जकड़ रखा है। यह लड़ाई अकेले नहीं जीती जा सकती। हमें इस उम्मीद की किरण को पूरा का पूरा सूरज बनाना होगा, तभी बदलाव आएगा।
मेरी पुकार
मेरा मकसद सिर्फ इतना है कि जो कहानियाँ उन बंद कमरों में कैद रह जाती हैं, उन्हें आसमाँ तक पहुँचाना है। उन्हें उड़ान देनी है, उन्हें पंख देने हैं। मैं कौन हूँ? मैं वही हूँ जो आपके अंदर का वह हिस्सा है जो उड़ना चाहता है। मैं चाहती हूँ कि हर लड़की यह तय करे कि उसे बंद कमरे की खिड़की से दिखता थोड़ा सा आसमाँ चाहिए, या फिर बाहर निकलकर पूरा आसमाँ।
क्या आप तैयार हैं इस लड़ाई में शामिल होने के लिए? क्या आप मेरे साथ मिलकर इस समाज की पुरानी सोच को बदलने के लिए तैयार हैं?
चलिए, साथ मिलकर उड़ान भरते हैं।
