“परंपरा – बेड़ियाँ या प्रगति ?”

चलिए आज हम कुछ ऐसा लेकर आए हैं, कि देखते है कितने लोग मेरे इन विचारों से सहमत हैं।ओर कितने लोग सहमत नही हैं।

“परंपरा “ये शब्द तो हम सब अपने बचपन से ही सुनते आए हैं, कभी दादी तो कभी नानी या फिर अपने ही परिवार के अलग – अलग सदस्यों से।

परंपरा जो हमें अपने मूल जड़ों से जोड़े रखती है, चाहें त्यौहार के रूप में,या किसी और अलग रूप में। ये हमें हमारी संस्कृति से मिलाती है,हमें ये महसूस कराती हैं कि हम कितने गौरवान्वित है कि हम इस संस्कृति में जन्मे हैं।

ये वो अदृश्य धागे होते है जो हमें दिखाई तो नहीं देते, लेकिन हमें एक दूसरे से जोड़े रखते हैं। हर समुदाय या हर देश की अलग – अलग परंपरा होती हैं। जो हमें एक दूसरे को मिलने पर एक दूसरे से जुड़ने में अलग ही अनुभव कराती हैं। और हां ये हमारे पूर्वजों के अनुभव भी होती हैं जो हमारी आज की भाग दौड़ बाली जिंदगी में भी अपनों का एहसास दिलाती हैं।

पर कुछ परंपरा हमारे बदलते जीवन के साथ बदलाव भी चाहती हैं, अगर हम ऐसा नहीं करते तो यही परंपरा हमारी प्रगति में बाधा भी बन जाती हैं।

खासकर के हमारे मध्यम वर्गीय समाज में तो ज्यादातर परंपरा महिलाओं या लड़कियों से जुड़ी होती हैं,जो उनके लिए बेड़ियां बन जाती हैं। उनके सपनों ओर उनकी उड़ान में, उनकी स्वतंत्रता में सामने एक दीवार बन कर खड़ी हो जाती हैं।

ऐसी परंपराओं को समय के साथ बदलना चाहिए ,जो हमारे समाज के सबसे अहम दो वर्ग को जकड़े न रखे। एक वर्ग महिलाओं का ओर दूसरा वर्ग आज के युवा का फिर वो लड़की हो या लड़का। ये परम्पराएं दोनों ही वर्ग को उड़ने नहीं देती उनकी स्वतंत्रता छीन लेती हैं।

ठीक वैसे ही जब कोई युवा – चाहें वो लड़का हो या लड़की अपने परिवार से जब अपनी कोई भी ऐसी बात को जो उनकी परंपरा से मेल नहीं खाती है, को साझा करते है, उस क्षण वह संवाद केवल एक राय नहीं रह जाता है ,बल्कि वर्षों से चले आ रहे उन सामाजिक मानकों की परीक्षा बन जाता है, जिन्हें हम ‘सुंदरता’ या ‘शालीनता’ का नाम देते हैं।

अंततः, परंपरा का अर्थ केवल पुरानी लकीरों को ढोना नहीं, बल्कि उन मूल्यों को बचाए रखना है जो हमें इंसानियत सिखाते हैं। जिस तरह एक पुराने घर की नींव वही रहती है, लेकिन हम उसके अंदर का माहौल अपनी आधुनिक जरूरतों के अनुसार बदल लेते हैं, ठीक वैसा ही तालमेल हमें अपने जीवन में भी चाहिए।जब हम परिवार के सामने अपनी बात रखते हैं, तो वह विद्रोह नहीं, बल्कि एक ‘नए पुल’ के निर्माण की शुरुआत होनी चाहिए। यह पुल ऐसा हो जो परंपरा के सम्मान और आधुनिकता की स्वतंत्रता को जोड़े। हमें यह समझने की जरूरत है कि परंपरा और प्रगति एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक ही गाड़ी के दो पहिये हैं।

क्या आप लोग भी मेरी इस बात से सहमत हो, कि हमें आज के दौर के हिसाब से अपनी परंपराओं में बदलाव लाना चाहिए।जो हमारी प्रगति में बाधा न बने।हमारे उस समुदाय के लिए जो इन परंपराओं का बोझ उठा रहे हैं।

आप अपने विचार को मेरे साथ साझा करें, ताकि हमें भी पता चले की जो हमारी सोच है वही आपकी,या फिर कुछ और।

आज के लिए अलविदा मेरे मित्रों।

आप सभी का धन्यवाद कि आप मेरे आर्टिकल को पड़ रहे हैं।”मेरे प्रिय पाठकों, मैं समाज में बदलाव के इस सफर में आप सभी को शामिल करना चाहती हूँ। आप मुझे ईमानदारी से बताएं कि आपको मेरे आर्टिकल कैसे लग रहे हैं? क्या ये आपकी सोच में कोई बदलाव ला रहे हैं?”आपकी एक राय मुझे एक हौसला देगी अपने इस नए सफर में आगे बढ़ने का।

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