क्या कभी एक दिन, या एक छड़ रुक कर आपने स्वयं से ये प्रश्न किया ?-
क्या मैं सच में जी रही हूँ या, सिर्फ निभा रही हूँ?
पहेली नजर में ये सवाल सुनने में बहुत साधारण लगता है,लेकिन जैसे – जैसे हम इसकी गहराई में उतरते हैं,ये उतना ही भीतर पहुँचता चला जाता है।
क्यों कि हमें पता ही नहीं चलता है कि,कब हम एक ही तरह का जीवन जीने लगते हैं।वही दिनचर्या,वही सुबह उठना ,वही जिम्मेदारी, वही उम्मीद और वही चेहरे। दिन बीत जाता,रात आ जाती ,और फिर वही सुबह।
ऐसा करते – करते न जाने कितना समय बीत जाता है।
क्या यही जीवन है?
क्या हम वास्तव में जी रहे हैं,या सिर्फ निभा रहे हैं, जो समाज और परिवार ने हमारे लिए तय कर दिया है?
क्या हमने कभी सोचा कि ,हमने वही पढ़ा जो हम पढ़ना चाहते थे।क्या हमने वही काम किया जो ,हम करना चाहते थे। क्या हम सच में शादी करना चाहते थे।क्या हम माता – पिता बनना चाहते थे। लेकिन हमने ये सब किया ,क्यों कि हमें यही बताया गया ,कि जीवन जीने का यही क्रम है।
हमें बचपन से जीना नहीं ,बस निभाना सिखाया जाता है।
यदि हम मध्यम वर्गीय समाज को देखें,तो वहां ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे , जहां कई ज़िंदगियाँ निभाई जा रही है,जी नहीं जा रही है ।
लोग अपने अधूरे सपनों, झूठी मुस्कानों और अनगिनत मुखौटों के स्तन जीते है। जहां हर दिन नया किरदार,हर पल नया अभिनय।
शायद उन्हें झूठी मुस्कान ज्यादा अच्छी लगती है,जो दुनिया को ये विश्वास दिला देती है,कि वे टूटे नहीं हैं।
लेकिन सच तो ये है,जो लोग ज्यादा हंसते दिखाई देते हैं,वही भीतर से ज्यादा टूटे हुए होते हैं।लेकिन जब उन्हें रोना होता है,तो वो भीड़ नहीं , एकांत तलाशते हैं।
ठीक वैसे ही –
जब एक पक्षी को पिंजरे में कैद कर दिया जाए, और उसको न खोला जाए,तो एक वक्त ऐसा भी आता है। जब पिंजरा खोल दिया भी जाए ,लेकिन पक्षी उड़ता नहीं है।इसलिए नहीं कि उसके पंख कमजोर है,बल्कि इसलिए उसने उड़ने पर विश्वास करना छोड़ दिया है।
हमारा जीवन भी कई बार ऐसा हो जाता है।
समाज का बनाया हुआ पिंजरा धीरे – धीरे हमें सहज लगने लगता है। और आजादी डराने लगती है, और बंधन अच्छे लगने लगते हैं।
इसी तरह जीवन निभाते – निभाते हम बहुत कुछ पा लेते है – नाम ,पहचान ,धन ,सफलता। लेकिन हम वह खो देते हैं,जो सबसे महत्वपूर्ण है।
हम स्वयं ।
अब प्रश्न यह नहीं कि दुनिया आपको कैसे देखती है?
प्रश्न ये है कि जब आप अकेले होते हैं,तो आप अपने साथ सहज होते हैं?
यदि ‘उत्तर ‘नहीं है,तो आप जी नहीं रहे है, बल्कि निभा रहे हैं।
जीना तो हम तब शुरू करते हैं,जब हम अपने निर्णय स्वयं लेने लगते हैं। जब ‘लोग क्या कहेंगे ?’ से अधिक महत्वपूर्ण हो ‘ मेरा मन क्या चाहता है ‘ हो जाता है।तब डर से बड़ा विश्वास हो जाता है,जब हमारी मुस्कान किसी अभिनय का हिस्सा नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व की सच्ची अभिव्यक्ति बन जाती है।
हमारे जीवन का उद्देश्य केवल ‘सफल होना ‘ही नहीं होना चाहिए,बल्कि स्वयं को पा लेना भी होना चाहिए।
जब हम स्वयं को पा लेते हैं, तभी से हमारी असली पहचान जन्म लेती है।
इसलिए जब हम अगली बार आईने के सामने खड़े हो,तब खुद का चेहरा न देखे ।
बल्कि ये देखे कि सामने जो व्यक्ति खड़ा है वह आप हैं या वह,जिसे समाज ने आप के भीतर गढ़ा है। क्योंकि जीवन का सबसे कठिन अभिनय वही है,जिसमें इंसान पूरी जिंदगी किसी और का किरदार निभाता रहता है, और भूल जाता है,कि वास्तव में वह कौन है
आज के लिए अलविदा मेरे मित्रों।