क्या हम सच में जी रहे हैं,या निभा रहे हैं।

क्या कभी एक दिन, या एक छड़ रुक कर आपने स्वयं से ये प्रश्न किया ?- क्या मैं सच में जी रही हूँ या, सिर्फ निभा रही हूँ? पहेली नजर में ये सवाल सुनने में बहुत साधारण लगता है,लेकिन जैसे – जैसे हम इसकी गहराई में उतरते हैं,ये उतना ही भीतर पहुँचता चला जाता है।Continue reading “क्या हम सच में जी रहे हैं,या निभा रहे हैं।”