क्या आप कभी अपने आप से मिले हैं?
यह प्रश्न सुनते ही शायद आपके मन में आया होगा—”कैसा अजीब सवाल है! मैं तो हर समय अपने साथ ही रहता हूँ।”
लेकिन क्या सच में ऐसा है?
ज़रा रुककर सोचिए।
मुझे लगता है कि इस प्रश्न ने कुछ क्षणों के लिए ही सही, आपके भीतर एक हलचल तो ज़रूर पैदा की होगी। शायद एक छोटा-सा सवाल भी उठा होगा—”क्या सच में?”
मुझे लगता है कि हम अपने पूरे जीवन में सबसे बड़ी गलती यही करते हैं कि हम कभी अपने आप से मिलने की कोशिश ही नहीं करते। या शायद सच यह है कि हम अपने भीतर उतरने से डरते हैं।
हम अपने जीवन में हज़ारों लोगों से मिलते हैं। उन्हें जानना चाहते हैं, उनके स्वभाव और व्यक्तित्व को समझने की कोशिश करते हैं। हम रिश्ते बनाते हैं, उनकी पसंद-नापसंद जानना चाहते हैं और उनके जीवन में अपनी जगह बनाने की कोशिश करते हैं।
लेकिन क्या कभी हमने उतनी ही जिज्ञासा अपने बारे में दिखाई?
क्या कभी खुद से पूछा कि मुझे वास्तव में किस बात से खुशी मिलती है? मैं सच में किस बात से डरता हूँ? मैं जैसा हूँ, वैसा क्यों हूँ?
अजीब बात यह है कि ये प्रश्न हम दूसरों से तो बड़ी आसानी से पूछ लेते हैं, लेकिन अपने आप से शायद ही कभी पूछते हैं। जबकि मुझे लगता है कि यहीं से अपने आप से मिलने की शुरुआत होती है।
अक्सर हम लोगों को कहते सुनते हैं कि “कुछ समय अकेले रहना चाहता हूँ।” लेकिन जब उनसे पूछा जाए कि अकेले रहकर क्या करना चाहते हो, तो ज़्यादातर जवाबों में अकेलापन नहीं, बल्कि कोई न कोई व्यस्तता होती है—फ़ोन, सोशल मीडिया, फ़िल्में, काम या फिर किसी और चीज़ में खुद को उलझा लेना।
यानी हम अकेले तो रहना चाहते हैं, लेकिन अपने साथ नहीं रहना चाहते।
पता नहीं अपने साथ रहना इतना मुश्किल क्यों लगता है।
अपने जीवन में मैंने एक और बात महसूस की है। बहुत से लोग अपने आप पर उतना भरोसा नहीं कर पाते, जितना किसी और के साथ होने पर करते हैं। उन्हें लगता है कि अगर कोई उनके साथ है, तो वे अधिक सुरक्षित हैं। शायद इसलिए कि उन्हें अपने निर्णयों और अपने भीतर की आवाज़ पर पूरा विश्वास नहीं होता।
इसी विषय पर एक बार मेरी बातचीत मेरे एक करीबी और परिचित व्यक्ति से हुई। मैंने उनसे कहा कि अब मैं अपने जीवन को अपने साथ जीना चाहती हूँ, अपने आप से मिलना चाहती हूँ। अभी मुझे अपने जीवन में किसी और के सहारे की तलाश नहीं है।
उन्होंने मेरी बात से असहमति जताई। उनका कहना था कि इंसान को हमेशा किसी न किसी के साथ की ज़रूरत होती है। हम अपने साथ कभी नहीं रह सकते, क्योंकि हमारा जीवन ही ऐसा बना है।
दिलचस्प बात यह थी कि यह बात कहने वाले व्यक्ति एक डॉक्टर थे। इससे मुझे यह महसूस हुआ कि अपने भीतर की खामोशी से असहज होना केवल किसी एक वर्ग की बात नहीं है। यह अनुभव शायद हम सबके भीतर कहीं न कहीं मौजूद है।
उन्होंने मुझसे कहा कि जब भी वे अकेले होते हैं, तो उनके मन में ऐसे विचार आने लगते हैं जिनसे उन्हें डर लगता है। इसलिए उन्हें लगता है कि कोई भी व्यक्ति लंबे समय तक अपने साथ नहीं रहना चाहेगा।
उनकी बात सुनकर मेरे मन में एक प्रश्न और गहरा हो गया।
क्या सच में अपने भीतर की खामोशी को सुनना इतना कठिन है?
आख़िर हमें अपने ही विचारों से डर क्यों लगता है?या फिर…
क्या हम सवालों से डरते हैं?
क्योंकि अपने आप से मिलना शायद उत्तर खोजने की शुरुआत नहीं, बल्कि सही प्रश्न पूछने की शुरुआत है।
तो बताइए…
आख़िरी बार आपने अपने आप से कब मुलाक़ात की थी?
अगर आज कुछ देर के लिए आपको केवल अपने साथ रहना पड़े, तो क्या आप सहज रह पाएँगे?
क्योंकि मुझे लगता है कि हर बदलाव की शुरुआत उत्तर से नहीं, बल्कि एक ईमानदार प्रश्न से होती है।
