क्या व्यस्त होना ही जीवन जीना है?

आज सुबह जब मेरी नींद खुली, तो हमेशा की तरह सबसे पहले फोन मेरे हाथ में था। कुछ देर बाद जल्दी-जल्दी अपने कामों में लग गई। एक काम खत्म होता, तो दूसरा सामने आ जाता। देखते ही देखते पूरा दिन इसी तरह निकल गया।

लेकिन रात को जब बिस्तर पर लेटी, तो अचानक मन में एक प्रश्न आया—

क्या आज मैंने ऐसा कोई काम किया, जिससे मुझे सच में खुशी मिली हो? कुछ नया सीखने को मिला हो? या फिर मैं पूरे दिन सिर्फ व्यस्त ही रही?

फिर सोचने लगी कि केवल आज का दिन ही नहीं, इसी तरह एक-एक दिन बीतता है, दिन महीनों में बदल जाते हैं और महीने देखते ही देखते एक वर्ष बन जाते हैं। लेकिन क्या इस पूरे समय में हमने कभी सच में जीवन को जिया है?

मेरी ज़िंदगी तो पिछले लगभग दस वर्षों से कुछ ऐसी ही चल रही है। अब जब पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो लगता है कि मैंने अपने सबसे कीमती समय को केवल बिताया है, जिया नहीं।

मुझे नहीं लगता कि ऐसा केवल मेरे साथ होता है। शायद यह दुनिया के हर इंसान की कहानी है, चाहे वह किसी भी देश, संस्कृति या समाज से क्यों न हो।

धीरे-धीरे हम इतने व्यस्त हो जाते हैं कि हमें यह एहसास ही नहीं रहता कि कब हमने केवल व्यस्त रहने को ही जीवन जीना मान लिया।

लेकिन क्या सचमुच दोनों एक ही बात हैं?

आज हर व्यक्ति किसी न किसी काम में व्यस्त है। छात्र पढ़ाई में, नौकरी करने वाला अपने काम में, गृहिणी घर की जिम्मेदारियों में, व्यापारी अपने व्यवसाय में। व्यस्त होना गलत नहीं है। जीवन में काम करना आवश्यक भी है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या हमारी पूरी ज़िंदगी केवल व्यस्तता बनकर रह गई है?

अगर आज किसी भी व्यक्ति से पूछ लिया जाए—”कैसे हो? इतने दिनों से मिले नहीं।”

तो अक्सर पहला जवाब यही मिलता है—

“क्या बताऊँ, समय ही नहीं मिलता।”

इसके बाद वही व्यक्ति शायद अपने दुख भी बताने लगे। वह यह भी कहे कि जिस काम में वह इतना व्यस्त है, उसी से वह खुश भी नहीं है। वह कुछ और करना चाहता है, लेकिन कर नहीं पा रहा।

तब मन में एक और प्रश्न उठता है—

क्या इसी तरह व्यस्त रहना जीवन का उद्देश्य है?

कभी-कभी मुझे लगता है कि क्या हम सच में जीवन जी रहे हैं, या केवल दिनों को पूरा कर रहे हैं?

हममें से न जाने कितने लोग ऐसे होंगे जिन्होंने बिना किसी काम के, बिना किसी जल्दी के, केवल शांति से बैठकर सूर्योदय देखा हो।

कितने लोग ऐसे होंगे जिन्होंने अपने किसी प्रिय व्यक्ति की पूरी बात बिना मोबाइल देखे सुनी हो।

और शायद हममें से बहुत से लोगों को यह भी याद नहीं होगा कि आख़िरी बार हमने बिना किसी भागदौड़, बिना किसी चिंता और बिना किसी जल्दबाज़ी के पूरा एक दिन कब जिया था।

एक विद्यार्थी पढ़ाई में इतना व्यस्त है कि उसके पास यह सोचने का भी समय नहीं कि जो वह पढ़ रहा है, क्या उसे सच में वही पढ़ना पसंद है।

ठीक इसी तरह एक व्यक्ति सुबह से शाम तक नौकरी में इतना व्यस्त रहता है कि उसके पास अपने माता-पिता या बच्चों के साथ कुछ पल बैठने का भी समय नहीं होता।

और सबसे दुखद बात यह है कि बहुत से लोग अपनी इच्छा से नहीं, बल्कि किसी न किसी दबाव, डर या मजबूरी में इस व्यस्तता को जी रहे होते हैं। उन्हें उस काम से खुशी नहीं मिलती, फिर भी वे उसी रास्ते पर चलते रहते हैं।

तो क्या केवल व्यस्त होना ही उद्देश्यपूर्ण जीवन जीना है?

व्यस्तता तो केवल यह बताती है कि हम कुछ कर रहे हैं।

लेकिन जीवन हमसे यह पूछता है—जो हम कर रहे हैं, क्या वही करना वास्तव में ज़रूरी है? क्या वही हमें उस जीवन की ओर ले जा रहा है, जिसे हम जीना चाहते हैं?

आज तकनीक ने हमारा बहुत-सा समय बचा दिया है। मोबाइल, इंटरनेट और अनेक सुविधाओं ने हमारे कई काम आसान कर दिए हैं। फिर भी हमारे पास समय नहीं है।

ऐसा क्यों?

आख़िर बचा हुआ समय जाता कहाँ है?

क्या वह समय हमने अपने विकास में लगाया? अपने परिवार के साथ बिताया? कुछ नया सीखने में लगाया? या फिर बिना सोचे-समझें मोबाइल की स्क्रीन पर, लगातार भागदौड़ में और हर समय व्यस्त दिखने की आदत में खो दिया?

शायद यही कारण है कि हम धीरे-धीरे उन चीज़ों से दूर होते जा रहे हैं जो हमारे जीवन को बेहतर बना सकती थीं।

पता नहीं कितने लोग ऐसे होंगे जिन्होंने नौकरी शुरू करने के बाद, या शादी के बाद, आख़िरी बार कोई किताब कब पढ़ी थी।

कितने लोगों ने अपने पुराने शौक केवल इसलिए छोड़ दिए क्योंकि उनके पास “समय नहीं था।”

और शायद सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि अगर एक दिन हमारे सारे काम खत्म हो जाएँ, तो क्या हमें यह भी पता होगा कि अपने साथ समय कैसे बिताना है?

मुझे लगता है कि समस्या व्यस्त होने में नहीं है।

समस्या तब शुरू होती है जब हम व्यस्त रहते-रहते यह भूल जाते हैं कि हम यह सब क्यों कर रहे हैं।

और अंत में मैं आपसे केवल एक प्रश्न पूछना चाहूँगी—

आज आप पूरे दिन बहुत व्यस्त रहे होंगे। लेकिन दिन खत्म होने पर एक बार खुद से पूछिए—क्या आज आपने केवल समय बिताया, या सच में कुछ ऐसा किया जिससे आपको लगा हो कि हाँ, आज मैंने थोड़ा-सा जीवन भी जिया है?

आज के लिए अलविदा मेरे मित्रों, धन्यवाद।

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