मजबूरी से मजबूती तक

एक छोटी सी कली जिसके आंखों में भी सपने थे, जो उड़ना चाहती थी,पूरे बगीचे में महकना चाहती थी,पर उसके खिलने से पहले ही किसी ने उसे तोड़ दिया।अक्सर यही हजारों कलियों के साथ होता हैं,लेकिन किसी को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता।

ऐसी बहुत सी कलियाँ होती हैं जो महकना चाहती है,पर वो खिलने से पहले ही मुरझा जाती है। ओर उनके मुरझाने की वजह होती हैं, मजबूरी। आखिर ये मजबूरी हमेशा कलियों के ही हिस्से में क्यों आती है ? क्या कोई इस बात पर विचार करेगा ।मुझे पता है यहां बहुत से लोग कहेंगे कि ऐसा तो नहीं होता ,पर सच तो ये है की ज्यादातर यही होता है।

ओर इस मजबूरी की वजह से कलियों को कितना कुछ खोना पड़ता हैं,ये कभी किसी ने जानने की कोशिश भी नहीं की होती हैं। क्यो की लोगो को इस बात से कोई फर्क पड़ता भी नहीं,उन्हें बस अपने सोच,ओर अपनी राय ही अच्छी लगती है।

वो कली जो इस मजबूरी में अपनी किताबें,अपने सपने ,ओर यहां तक कि अपनी पहचान तक छोड़ देती ही। ओर इसके बाद भी मुस्करा रही होती है।क्यों की ये समाज उनको रोने का भी हक नहीं देता । कही कली के रोने से उनके बनाए झूठ की मालायें टूट कर न बिखर जाए ।चाहे फिर इन सब में एक या हजारों कलियों की जिंदगी ही क्यों न बिखर रही हो।

ऐसे हजारों ही उदाहरण है समाज में, जिनकी वजह से किसी न किसी कली की जिंदगी बिखरी होगी।शायद इस समय में हर घर में एक बिखरी कली मिल ही जाएगी।

यहां में किसी ओर का नहीं अपना ही उदाहरण ले रही हूं,मेरे साथ भी यही हो रहा था पिछले दस वर्षों से।अब जब हमें समझ आया ओर इसके खिलाफ आवाज उठायी तो मेरे ही चरित्र पर उँगली उठाने लगे मेरे अपने ही,जिनके लिए हमने अपने सपने ,अपना बचपन सब छोड़ दिया था, क्यों की मुझे भी यही कहा गया अभी मजबूरी समझो।आज वही अपने मुझसे बात तक करना पसंद नहीं करते ।

ऐसा सिर्फ मेरे साथ ही नहीं बल्कि बहुत सी कलियाँ है, जो ये सब सह रही है ओर उसके बाद जब वो एक उम्मीद के साथ खुद के सपनों के लिए खड़ा होना चाहती है,फिर से खिलना चाहती है तो उनके चरित्र को हथियार बना कर उन पर बार किया जाता हैं।

पर ये कोई नहीं जानता है,कि अगर कोई भी लड़की मजबूरी में सब सह सकती है,तो सोचो उसने कितनी ताकत इकट्ठी की होगी उस मजबूरी ओर मजबूरी के पीछे छिपे डर से लड़ने के लिए।

उसने हर दिन अपने टूटते सपने ओर बिखरती जिंदगी को देखकर खुद को मजबूत बनाया होगा ।कि अब वो न तो किसी मजबूरी के सामने झुकेगी ओर न ही उसको दबाने के लिए उसके चरित्र पर लगाए गए आरोपों से रुकेगी।

यहीं से उस कली को मजबूरी से लड़ने की ताकत मिलती है,ओर एक दिन वो कली इन सभी मजबूरी को पीछे छोड़ मजबूती के साथ खिलेगी,ओर महकेगी ,फिर कोई भी उसको न तो तोड़ सकेगा और न ही मुरझाने पर मजबूर करेगा।क्यों कि कली अब पहले से मजबूत इतनी मजबूत अब वो अकेले नहीं खिलेगी ,बल्कि अपनी जैसी कलियों को साथ लेके खिलेगी।

वैसे भी यही समाज कहता है कि एक को झुकना थोड़ा आसान हो सकता हैं लेकिन एक साथ एक समूह को झुकना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होता है,फिर उसके सामने समाज झुकता है।

आज का लेख अगर आपको अच्छा लगे ,लगे कि आप भी मेरे साथ खिलना चाहती है,तो कॉमेंट करके जरूर बताएं। आखिर हम भी देखना चाहते है मेरे साथ कितनी कलियां है,या कितने कलियों के परिजन है जो चाहते है उनकी कलियां खिले ओर महके इतना कि उनकी खुशबू से समाज बदल सके ।

आज के लिए अलविदा मेरे मित्रों।

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