दो सफर _
पता नहीं क्यूं आज अचानक ऐसा महसूस हुआ कि हम एक साथ 2 सफ़र पर निकले हो, कभी तो कुछ कहने का मन करता तो कभी शांत रहने का फिर भी खुद को समझ न पाए कि आखिर हम चाहते क्या है लेकिन इसका क्या फायदा कि हमें क्या चाहिए हम तो करेंगे वही जो समाज हमसे कराना चाहता है या यूं कहे कि जो हमारे अपने हमसे चाहते हो यही सोचते _ सोचते कब सुबह से शाम हो गई पता ही नहीं चला। फिर उठ कर खुद को आईना में देखा ओर पाया कि हम अकेले हैं नहीं सामने आईना में दो लोग नजर आए एक वो जो हम खुद है ओर दूसरी वो जो समाज के या घर बालों के दवाब में आकर बनी तब समझ आया कि हम एक साथ दो सफर में चल रहे हैं। फिर याद आया कि हम जो स्वयं है वो तो कहीं खो सी गई है,ओर जो सभी के सामने नजर आती हैं वो तो हम है ही नहीं पता नहीं क्यूं हम होकर भी हम नहीं हैं।ओर ये दोहरा सफर जो अब एक घुटन बनता जा रहा है कब तक चलेगा कुछ नहीं पता लेकिन एक बात तो साफ है जो 2 नाव पर सवार होते है वो हमेशा डूबते हैं मुझे भी पता अगर एक सफर नहीं चुना तो मेरी नाव भी जल्दी डूबेगी। अब बात आती है आखिर कौन सा सफर चुने, वो जो हम है या वो जो हमें बना दिया गया है। आखिर क्यों इतना मुश्किल हो जाता है अपने लिए खड़े होना क्यों हम हमेशा बेड़ियाँ ही चुनते हैं अपनी स्वेक्षा से न सही किसी के दबाव में आकर ही सही पर हम अपने लिए पिंजरा चुन ही लेते है ।
आत्मविश्वास की कमी
जरा देखो खुद को क्या हो तुम क्या यही हो तुम या कुछ ओर ये सवाल पूछा जब खुद से तो आईना में खड़ी दूसरी तरफ वो में जो में स्वयं हूँ से जवाब आया में तो यही हूं पर सवाल करने बाली कोई ओर है ओर जो सवाल कर रही उससे अगर पूछा जाए की आखिर तुम कौन हो तो जवाब आयेगा टूटे हुए सपने , बिखरा हुआ चरित्र ओर कहीं खोया हुआ आत्मविश्वास जो है ही नहीं क्या यही हूं में।आखिर क्यों मेरे पास आत्मविश्वास नहीं है क्यों हमें एक सहारा चाहिये। सहारे की जरूरत भी उन्हें ही होती हैं जिनमें आत्मविश्वास की कमी होती हैं जिन्हें हमेशा एक उंगली चाहिए होती हैं जिसे पकड़ कर अपना सफर तय कर सके ,पर ऐसे लोग ज्यादा दिनों तक जीवित नहीं रहते हैं क्यों की मर तो वो पहले ही चुके हैं बस अब सिर्फ शरीर बचा होता हैं। ये सिर्फ मेरी ही बात नहीं ये हर उस लड़की की कहानी है जो दो सफर में चल देती हैं किसी न किसी परिस्थिति की वजह से ।
आखिर क्यों हमें इतना भी हक नहीं दिया जाता की हम ये तय कर सके की हम किस एक सफर पर चलना चाहते हैं। क्या यही जीवन होता है,क्या इसे ऐसे जीने के लिए हम आए हैं इस संसार में, वो संसार जो इतना बड़ा ओर सुंदर भी है जिसे हम देखे बिना ही चले जाएंगे ,हमें तो पता भी नहीं चलेगा कि जहां हम है उसके आगे एक सुंदर संसार है जिसमें बहुत कुछ देखने ओर सीखने के लायक भी है,लेकिन हमारी जिंदगी की सीमाएं तय कर दी जाती है जिसके आगे का हमें पता हीं नहीं चलता की कुछ ऐसा भी है अगर हमें मिल गया तो हम शायद ही किसी के हाथ आए हम भी खुद से चल सकेंगे नहीं चाहिए किसी ओर का सहारा हमें लेकिन हमें इस मूल्यवान ओर कीमती चीजों से दूर रखा जाता हैं हमें इतना जकड़ दिया जाता है तुच्छ वस्तुओं से की हम ऊपर उठ कर देख ही नहीं पाते ।।
तुच्छ वस्तुओं से प्रेम
आखिर इतना प्रेम तुच्छ वस्तुओं से क्यों हमारे लिए ये इतनी मूल्यवान वन जाती हैं, क्यों हम इन में अपना जीवन ओर अपनी आजादी कुर्बान कर देते है क्यों,इसका जवाब मिला की हमें बताया ही यही जाता है की ये इतनी मूल्यवान है कि उसके लिए हमें अपनी आजादी कुर्बान करनी होगी तभी हमें मिलेंगी, ये बताना बाला कोई ओर नहीं बल्कि अपने ही होते है ओर हमें लगता है अगर अपने कह रहे तो सही कह रहे हैं ओर हम अपनी आजादी कुर्बान कर देते हैं इन तुच्छ वस्तुओं के लिए । क्यों की हमें बताया ही नहीं जाता कि इससे भी मूल्यवान ओर कीमती चीजें है दुनिया में जो अगर पा लिया तो जीवन ही , सोच ही बदल जाएगी ओर शायद किसी के दवाब में न आए हम किसी से डरे भी नहीं ओर किसी के सामने झुके भी नहीं, इस लिए ये तुच्छ वस्तुओं को इतना कीमती बना दिया जाता हैं की हम असली मूल्यवान चीज़ों को पाने के बारे में सोचते भी नहीं ।
हमें समझना होगा ओर जानना होगा की क्या हमारे लिए जरूरी है ओर क्या हमें जकड़ रही है।ये बात वो खुद को समझा रही थी जो वो खुद है न की वो जो समाज ने उसे बनाया है,उसे समझना होगा की वो एक सफर तय करे ओर वो सफर वो खुद का हो , आत्मचिंतन का हो,आत्मज्ञान का हो ओर अपनी असली पहचान का हो न की किसी बाहरी दबाव से जन्मी पहचान का हो।खुद के लिए लड़ो अगर नहीं लड़े नहीं खड़े हुए तो इसे ही नकली पहचान ओर सीमित सफर तय कर पाओगी । कभी भी असली मंजिल तक नहीं पहुंच पाओगी।
अपनी खोज कीजिए और मिलिये उस शख़्स से जो तुम्हारा अपना सबसे बेहतर दोस्त/मित्र है। अपनी असली पहचान से मिलिए।
आज के लिए अलविदा मेरे मित्रों फिर जल्द मिलेंगे।